छत्तीसगढ़ राज्य 1 नवंबर को 24 वर्ष का हो जाएगा। वर्ष 2000 में राज्य का गठन हुआ था, और इससे दो साल पहले 1998 में कोरबा जिला अस्तित्व में आया। राज्य के गठन के बाद से कोरबा ने तेज़ी से विकास किया और इसे राज्य की ऊर्जा राजधानी माना जाता है। देश की ऊर्जा आवश्यकताओं के लगभग 20 प्रतिशत कोयले की आपूर्ति कोरबा की खदानों से होती है। यहाँ स्थित गेवर और कुसमुंडा खदानें दुनिया की दूसरी और चौथी सबसे बड़ी कोयला खदानें हैं।
इनसे प्राप्त कोयले पर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि कई अन्य राज्यों के पावर प्लांट निर्भर हैं,जो विद्युत उत्पादन करते हैं।कोयला परिवहन से भारतीय रेलवे कोरबा से लगभग 7000 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व प्राप्त करती है।इसके अलावा, खनिज ट्रस्ट निधि से जिले के विकास के लिए प्रशासन को औसतन 300 करोड़ रुपये का वार्षिक फंड मिलता है।हालाँकि इतनी उपलब्धियों के बावजूद, कोरबा अभी भी विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ है।यहाँ के लोगों को कोयला खदानों से प्रदूषण और पावर प्लांट्स की राख जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।खदानों के लिए जिन लोगों की जमीनें ली गईं, उनकी समस्याएँ आज भी बरकरार हैं।स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी कोरबा बड़े शहरों से पीछे है।जिले में रेलवे लाइन 60 के दशक में विकसित हुई थी,जब यहाँ पहली बार कोयला निकासी शुरू हुई थी।हालाँकि यहाँ से कोयले के परिवहन के लिए रेलवे लाइन का विस्तार किया गया,लेकिन यात्री ट्रेनों की सुविधा आज भी नदारद है।शिवनाथ, विशाखापटनम लिंक एक्सप्रेस, हसदेव एक्सप्रेस और कोरबा-यशवंतपुर एक्सप्रेस जैसी कुछ ही गाड़ियाँ यहाँ से चलती हैं।यात्री ट्रेनों की कमी को लेकर जनता निराश है, जबकि रेलवे को यहाँ से माल ढुलाई से 7000 करोड़ रुपये की आय होती है।
पिछले 5 वर्षों में कोरबा में कोई नया उद्योग स्थापित नहीं हुआ है, जिससे व्यापार में भी वृद्धि नहीं हुई है। राज्य बनने के बाद, जब केंद्र में बीजेपी सरकार आई, तो नियम बनाया गया कि खनिज ट्रस्ट फंड का पैसा जिले में ही रहेगा और उसके विकास पर खर्च होगा। 2016 से कोरबा जिले को औसतन 300 करोड़ रुपये का वार्षिक फंड मिला है, जिसे विकास योजनाओं पर खर्च किया जाना था, लेकिन इस निधि के उपयोग में अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। हाल ही में, आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त माया वॉरियर को ईडी ने इस फंड में गड़बड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया है।
कोरबा कोयला और विद्युत उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।यहाँ की खदानों से हर साल लगभग 180 मिलियन टन कोयला निकाला जाता हैऔर दर्जनभर पावर प्लांट्स का संचालन होता है, जो प्रतिदिन लगभग 3000-3500 मेगावाट बिजली का उत्पादन करते हैं।यहाँ का मिनीमाता बांगो डेम, जो हसदेव नदी पर 1967 में बना था,भी महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से जिले में केवल 6000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो पाती है,जबकि पड़ोसी जिलों को ज्यादा लाभ मिलता है।वहीं, नगर निगम क्षेत्र में सड़कों की स्थिति अत्यंत खराब हैऔर फंड की कमी के चलते सुधार नहीं हो पा रहा है।कोरबा में पर्यटन की संभावनाएँ भी मौजूद हैं।कुछ समय पहले सतरेंगा को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनाने की दिशा में कार्य शुरू हुआ है।यहाँ के बुक्का क्षेत्र, जो 32 छोटे द्वीपों में विभाजित है, में भी पर्यटन के विस्तार की संभावना है।कोरबा का वन क्षेत्र हाथियों का स्थायी निवास बन गया है, हालांकि यहाँ हाथी-मानव संघर्ष एक बड़ी समस्या बन चुकी है।इसके अलावा, पर्यावरण के क्षेत्र में भी कोरबा कई चुनौतियों का सामना कर रहा है,क्योंकि कोयला खनन के चलते हसदेव के जंगलों का क्षेत्रफल घटता जा रहा है।
जिले में बाल्को, जो कि देश की तीन प्रमुख एल्यूमिनियम उत्पादन इकाइयों में से एक है, स्थापित है। यहाँ एक एल्यूमिनियम पार्क की योजना थी, ताकि सहायक उद्योग स्थापित हो सकें, परंतु यह आज तक पूरा नहीं हुआ है। यहाँ बड़े उद्योग स्थापित हुए, लेकिन सहायक उद्योगों की कमी रही।
पर्यावरण कार्यकर्ता लक्ष्मी चौहान का कहना है कि राज्य के गठन के बाद से कोरबा में खनन, बिजली संयंत्र और एल्यूमिनियम संयंत्र का विस्तार हुआ है,लेकिन मानव विकास सूचकांक की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है।स्वास्थ्य क्षेत्र में राजधानी पर निर्भरता और यातायात समस्या यहाँ की प्रमुख चुनौतियाँ हैं।सड़क दुर्घटनाओं में यहाँ कई लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।कोरबा जिले के खनन क्षेत्र में तकनीक के प्रयोग पर SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) का PRO सुनिश चंद्रा बताते हैंकि SECL में कई तकनीकी सुधार हुए हैं, जिससे कोयले का उत्पादन तेजी से और पर्यावरण के अनुकूल हो रहा है।